हराभरा विभाग में सीमेंट खरीदी का खेल या कमीशन का मेल? "अपनों को ठेंगा, परायों को मेवा", बाहर के सप्लायरों पर मेहरबानी से घिरा वन विभाग

महासमुंद | स्वाभिमान न्यूज़

जिले का हराभरा विभाग एक बार फिर "दाल में कुछ काला नहीं, पूरी दाल ही काली है" जैसी कहावत को चरितार्थ करता नजर आ रहा है। इस बार मामला लाखों रुपये की सीमेंट खरीदी का है, जिसमें स्थानीय व्यापारियों को दरकिनार कर बिलासपुर और राजनांदगांव से सीमेंट खरीदने की कहानी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। विभाग की इस कार्यप्रणाली को लेकर गलियारों में चर्चा है कि कहीं "सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे" वाले अंदाज में सरकारी राशि के बंदरबांट का खेल तो नहीं खेला गया।




जिले में सैकड़ों हार्डवेयर और सीमेंट विक्रेता मौजूद हैं। बाजार में हर नामी ब्रांड की सीमेंट आसानी से उपलब्ध है। इसके बावजूद विभाग को न जाने कैसी "दिव्य दृष्टि" मिली कि उसे महासमुंद जिले की एक भी दुकान योग्य नहीं लगी और सैकड़ों किलोमीटर दूर बैठे बिलासपुर और राजनांदगांव के सप्लायरों पर ही भरोसा जताया गया। सवाल उठना लाजिमी है कि क्या पूरे जिले में सीमेंट का अकाल पड़ गया था, या फिर मामला "अपनों को छोड़ परायों पर प्यार लुटाने" का था?


सूत्र बताते हैं कि लाखों रुपये की खरीदी में स्थानीय विक्रेताओं को मौका तक नहीं दिया गया। ऐसे में लोगों के बीच चर्चा है कि कहीं यह पूरा खेल पहले से तय पटकथा के अनुसार तो नहीं खेला गया। क्योंकि सरकारी खरीद में जब स्थानीय बाजार उपलब्ध हो, तब दूरस्थ जिलों से सामग्री खरीदना अपने आप में संदेह को जन्म देता है।


मामले की सबसे दिलचस्प बात यह है कि विभाग के जिम्मेदार अधिकारी अब चुप्पी साधे हुए हैं। कहा जा रहा है कि फाइलों में सब कुछ नियमों के मुताबिक दिखाने की कोशिश की गई, लेकिन जमीन पर कहानी कुछ और ही नजर आ रही है। आम लोगों का कहना है कि "चोर की दाढ़ी में तिनका" वाली स्थिति इसलिए पैदा हो रही है क्योंकि विभाग आज तक यह स्पष्ट नहीं कर पाया कि आखिर स्थानीय दुकानदारों को क्यों नजरअंदाज किया गया।सवाल यह है कि आखिर ऐसी कौन-सी मजबूरी थी कि जिले की दुकानों को छोड़कर बाहर के सप्लायरों पर मेहरबानी दिखाई गई?


जानकारों का मानना है कि यदि खरीदी प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच कराई जाए तो कई ऐसे तथ्य सामने आ सकते हैं जो "ऊंट के मुंह में जीरा" नहीं बल्कि बड़े वित्तीय खेल की ओर इशारा करेंगे। सवाल यह भी है कि क्या परिवहन खर्च सहित अन्य मदों में अतिरिक्त भुगतान कर शासन को आर्थिक नुकसान पहुंचाया गया? यदि हां, तो इसकी जवाबदेही किसकी होगी?


शहर में चर्चा है कि विभाग के कुछ जिम्मेदार अधिकारी अपने कंधों पर तीन सितारे सजाकर भले ही वातानुकूलित कमरों में बैठकर खुद को नियमों का प्रहरी बताते हों, लेकिन सीमेंट खरीदी का यह मामला उनके दामन पर कई सवालिया निशान छोड़ रहा है। जनता पूछ रही है कि आखिर सरकारी धन का इस्तेमाल जनहित में हुआ या फिर "माल अंदर, हिसाब बाहर" की तर्ज पर खेल खेला गया?


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सीमेंट सप्लाई हुई या केवल कागजों में बिल काटे गए? मामला गंभीर है। जांच के बाद सामने आएगा असली खेल और बेनकाब होंगे पर्दे के पीछे के चेहरे।


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