पिथौरा | स्वाभिमान न्यूज़
सेवा से बड़ा कोई धर्म नहीं और प्यासे को पानी पिलाना सबसे बड़ा पुण्य जैसी कहावतों को चरितार्थ करते हुए सिख समाज पिथौरा ने सिख धर्म के पांचवें गुरु श्री गुरु अर्जुन देव जी के शहीदी दिवस पर श्रद्धा, सेवा और समर्पण का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया। पूरे आयोजन में श्रद्धा ऐसी उमड़ी कि मानो भक्ति और सेवा की गंगा एक साथ बह निकली हो।
श्री गुरु सिंह सभा गुरुद्वारा साहिब में सुबह 5 बजे से गुरुवाणी, कीर्तन और अरदास का आयोजन किया गया। गुरु की महिमा का गुणगान करते हुए संगत ने मानवता, भाईचारे और सेवा के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया। वातावरण इतना भक्तिमय था कि हर कोई श्रद्धा के रंग में रंगा नजर आया।
धार्मिक कार्यक्रम के उपरांत गुरुद्वारा साहिब के बाहर छबील (शरबत) वितरण का आयोजन किया गया। भीषण गर्मी के बीच यह सेवा राहगीरों के लिए "तपती धूप में ठंडी छांव" साबित हुई। दोपहर 2 बजे तक चलने वाले इस सेवा अभियान में आने-जाने वाले लोगों, अस्पताल के मरीजों और उनके परिजनों, जनपद पंचायत परिसर में पहुंचे ग्रामीणों तथा बस यात्रियों को शीतल छबील वितरित की गई।
युवा खालसा दल के युवाओं ने इस आयोजन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। सेवा का ऐसा जज्बा देखने को मिला कि सभी युवा "तन-मन से जुट गए" और बिना थके लोगों तक छबील पहुंचाते रहे। सेवा भाव से सराबोर इस आयोजन ने एक बार फिर साबित कर दिया कि सिख समाज मानव सेवा को ही सच्ची प्रभु भक्ति मानता है।
इस अवसर पर त्रिलोक सिंह सलूजा, राजेंद्र सिंह खनूजा, ज्ञानी लवप्रीत सिंह, नारायण सोनी, सतप्रीत सलूजा (विक्की), दीपक सलूजा, राजा खनूजा, सोनू छाबड़ा, सोनू नारंग, गुरुदीप सलूजा, अमित सलूजा, संदीप अजमानी, रौनक सलूजा, गुरमीत सिंह छाबड़ा, सुप्रीत सिंह नारंग, अनमोल चावला, दलबीर सिंह नारंग, रवि चावला, मोनू नारंग, सौरभ अजमानी, तारी टुटेजा, तनवंत खनूजा, अवनीत गंभीर और मेहर सलूजा सहित समाज के अनेक सदस्य उपस्थित रहे।
सिख समाज के नन्हे बच्चों ने भी सेवा कार्य में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और "पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं" कहावत को सार्थक कर दिया। अनंत सलूजा, मन्नत सलूजा, राजवीर सलूजा, ईशित खनूजा, सचनित अजमानी, शानवीर सलूजा, गुरुषित टुटेजा, दर्शित टुटेजा, ओंकार सलूजा और उदम मक्कड़ सहित बच्चों ने छबील वितरण में सहयोग कर समाज सेवा के संस्कारों का परिचय दिया।
गुरु अर्जुन देव जी के शहीदी दिवस पर आयोजित यह कार्यक्रम न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक बना, बल्कि समाज को यह संदेश भी दे गया कि "नर सेवा ही नारायण सेवा है" और मानवता की सेवा से बढ़कर कोई धर्म नहीं।

