स्वाभिमान न्यूज़ | महासमुंद
जिले में सत्ता की धमक और रसूख के दम पर नियमों को ताक पर रखने का एक बड़ा मामला सामने आया है। एक वर्तमान विधायक प्रतिनिधि द्वारा अपनी पत्नी के नाम वर्ष 2005 में खरीदी गई 'बड़े झाड़ का जंगल' मद की सरकारी भूमि का नामांतरण कराने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाया जा रहा है। दिलचस्प बात यह है कि तहसील, एसडीएम और संभागीय आयुक्त की अदालतों से झटका लगने के बाद भी अब सत्ता का संरक्षण मिलते ही एक बार फिर इस शासकीय भूमि को निजी खाते में दर्ज कराने की कवायद शुरू कर दी गई है।
तीन अदालतों से आवेदन खारिज होने के बाद चौथी बार तहसील में गुहार, 2005 में पत्नी के नाम खरीदी गई थी शासकीय भूमि
दो दशक बाद जागी नामांतरण की इच्छा
संबंधित विधायक प्रतिनिधि ने करीब 20 साल पहले (2005 में) ग्राम चिखली स्थित भूमि खसरा नम्बर 20 एवं 662 को अपनी पत्नी के नाम पर यह सरकारी भूमि खरीदी थी। तब से यह मामला ठंडे बस्ते में था, लेकिन जैसे ही इस व्यक्ति को राजनीतिक पद (विधायक प्रतिनिधि) की शक्ति मिली, उन्होंने दो दशक पुराने इस मामले को फिर से जीवित कर दिया है। बताया जा रहा है कि इस भूमि का मद बड़े झाड़ का जंगल, इमारती लकड़ी व चरागान हेतु आरक्षित शासकीय राजस्व अभिलेख में दर्ज है।
तहसील से लेकर कमिश्नर कोर्ट तक मिली शिकस्त
नामांतरण के इस खेल में विधायक प्रतिनिधि को अब तक हर कानूनी मोर्चे पर हार का सामना करना पड़ा है:
तहसील न्यायालय: सबसे पहले यहां आवेदन लगाया गया, जिसे भूमि के शासकीय स्वरूप (बड़े झाड़ का जंगल) को देखते हुए निरस्त कर दिया गया।
अनुविभागीय अधिकारी (एसडीएम) कोर्ट: तहसील के फैसले के खिलाफ यहां अपील की गई, जिसे एसडीएम ने भी खारिज कर दिया।
आयुक्त न्यायालय (रायपुर संभाग): अंत में मामला कमिश्नर कोर्ट पहुंचा, जहां वरिष्ठ अधिकारियों ने निचली अदालतों के फैसले को सही ठहराते हुए स्पष्ट किया कि शासकीय भूमि का निजी नामांतरण नहीं किया जा सकता।
रसूख के दम पर फिर से वही दांव
हैरानी की बात यह है कि तीन उच्च राजस्व अदालतों से आवेदन निरस्त होने के बावजूद, हाल ही में विधायक प्रतिनिधि ने पुन: तहसील कार्यालय में अपनी पत्नी के नाम नामांतरण का आवेदन प्रस्तुत किया है। प्रशासनिक गलियारों में चर्चा है कि यह सब केवल राजनैतिक दबाव के चलते किया जा रहा है। जानकारों का कहना है कि जब एक बार कमिश्नर कोर्ट से आदेश पारित हो चुका है, तो पुन: उसी मामले को निचली अदालत में लाना विधिक प्रक्रिया का उल्लंघन है।
जबकि नियमों के अनुसार, 'बड़े झाड़ का जंगल' की भूमि बिना सक्षम अधिकारी के अनुमति के न तो बेची जा सकती है और न ही इसका नामांतरण किसी निजी व्यक्ति के नाम पर हो सकता है। ऐसे में सवाल उठता है कि:
वर्ष 2005 में इस प्रतिबंधित भूमि की रजिस्ट्री कैसे हुई?
क्या सत्ता के दबाव में राजस्व विभाग के नियम बदल जाएंगे?
तीन अदालतों के फैसले को दरकिनार कर बार-बार आवेदन क्यों स्वीकार किया जा रहा है?
फिलहाल, इस मामले के दोबारा खुलने से क्षेत्र में चर्चाओं का बाजार गर्म है और विपक्षी दल भी इस मुद्दे पर प्रशासन की कार्यप्रणाली पर नजर टिकाए हुए हैं। अब देखना होगा कि राजस्व अधिकारी नियमों का पालन करते हैं या रसूख के आगे नतमस्तक होते हैं।

