पिथौरा के सरिफाबाद में जमीन का अनोखा खेल: एक ही रकबे पर दो जिलों के दो अलग-अलग मालिक, राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल

ललित मुखर्जी | संपादक

पिथौरा (स्वाभिमान न्यूज़)। महासमुंद जिले के पिथौरा तहसील अंतर्गत आने वाले ग्राम सरिफाबाद में जमीन के मालिकाना हक को लेकर एक ऐसा पेचीदा मामला सामने आया है, जिसने न केवल ग्रामीणों को अचंभित कर दिया है बल्कि राजस्व विभाग की चूलें हिला दी हैं। 




ग्राम सरिफाबाद के पटवारी हल्का नंबर 44 में स्थित लगभग 22.46 एकड़ बेशकीमती जमीन को लेकर अब दो जिलों के किसान आमने-सामने आ गए हैं। इस विवाद ने तब तूल पकड़ा जब हाल ही में इस जमीन की खरीदी-बिक्री की गई, जिसके बाद रिकॉर्ड खंगालने पर पता चला कि एक ही खसरा नंबरों वाली जमीन पर अलग-अलग गांवों के दो-दो दावेदार मौजूद हैं। इस अजीबोगरीब स्थिति ने राजस्व अमले में हड़कंप मचा दिया है और अब दोनों पक्ष एक-दूसरे के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए प्रशासन से न्याय और निष्पक्ष जांच की गुहार लगा रहे हैं।


विवाद की जड़ में ग्राम सरिफाबाद के खसरा नंबर 312, 314, 316, 323, 327, 322/1, 320, 318, 328, 337/2 एवं 329/2 शामिल हैं। सरकारी दस्तावेजों की विसंगति ऐसी है कि यह कुल रकबा राजस्व अभिलेखों में महासमुंद जिले के ग्राम छोटेटेमरी के किसानों के नाम पर भी दर्ज है और साथ ही पड़ोसी जिले बलौदाबाजार के ग्राम सोनपुर निवासी किसानों के नाम पर भी चढ़ा हुआ है। इसका सीधा मतलब यह है कि एक ही भू-खंड के लिए सरकारी कागजों में दो अलग-अलग जिलों के लोग 'भूमिस्वामी' बने बैठे हैं। मामला तब और गंभीर हो गया जब महासमुंद जिले के किसानों ने इस वर्ष जनवरी 2026 में इस जमीन का सौदा कर इसकी बिक्री भी कर दी। अब जब दूसरे पक्ष को इसकी भनक लगी, तो दावों और प्रति-दावों का दौर शुरू हो गया है, जिससे प्रशासन के सामने पहचान का बड़ा संकट खड़ा हो गया है।


महासमुंद जिले के ग्राम छोटेटेमरी निवासी किसान मधु केंवट, अशोक यादव, तेजकुमार वैष्णव और नित्यानंद रावत ने अपने पक्ष में दलील देते हुए कहा है कि उक्त विवादित भूमि उनके पूर्वजों की विरासत है जो उन्हें शासन द्वारा बहुत पहले प्रदान की गई थी। उनके अनुसार, वर्ष 1990-91 में शासन ने उन्हें विधिवत भूमिस्वामी घोषित करते हुए पट्टा जारी किया था और तब से वे ही इस जमीन के वास्तविक मालिक हैं। किसानों का दावा है कि उनके पास पट्टे से लेकर वर्तमान तक के सभी वैध दस्तावेज मौजूद हैं और इसी आधार पर उन्होंने जनवरी 2026 में इस भूमि की रजिस्ट्री भी संपन्न की है। वहीं दूसरी ओर, बलौदाबाजार जिले के ग्राम सोनपुर के किसानों का अपना अलग दावा है। उनका कहना है कि यह जमीन उनके अधिकार क्षेत्र और कब्जे में है, जिसके चलते सरिफाबाद की इस जमीन पर उनका हक बनता है।


इस पूरे प्रकरण में राजस्व विभाग की भूमिका पर भी उंगलियां उठ रही हैं क्योंकि स्थानीय पटवारी राजेंद्र डोंगरे का कहना है कि उनके पास मौजूद सभी रिकॉर्ड्स में यह जमीन भूमिस्वामी हक में दर्ज है और किसानों को 1990-91 में ही पट्टा दिया जा चुका है। सवाल यह उठता है कि यदि एक पक्ष के पास वैध पट्टा और रिकॉर्ड है, तो दूसरे जिले के किसानों का नाम उसी जमीन पर कैसे दर्ज हुआ। 


क्या यह महज एक लिपिकीय त्रुटि है या फिर इसके पीछे कोई बड़ा भू-माफिया सक्रिय है जिसने अधिकारियों की मिलीभगत से रिकॉर्ड में हेरफेर किया है। मामले की गंभीरता और बढ़ते जनाक्रोश को देखते हुए जिले के वरिष्ठ अधिकारियों ने इसमें हस्तक्षेप किया है। कलेक्टर के निर्देश पर अब डिप्टी कलेक्टर तेजपाल सिंह इस पूरे मामले की कमान संभालते हुए गहन जांच कर रहे हैं।


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