कोटवारी भूमि पर बसा रुक्मणि विहार, प्रशासन की चुप्पी से परेशान कोटवार परिवार

स्वाभिमान न्यूज़ | आंजनेय पांडेय, कैफ खान

रायगढ़। शहर में जमीन की बढ़ती भूख अब उस हद तक पहुंच गई है कि कोटवारी और आदिवासी भूमि भी सुरक्षित नहीं रह गई है। ताज़ा मामला कोटवारी भूमि पर कथित रूप से बसे रुक्मणि विहार का है, जिसने राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली और प्रशासनिक लापरवाही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।



प्राप्त जानकारी के अनुसार खसरा नंबर 253/1, रकबा लगभग 0.320 हेक्टेयर, शासकीय अभिलेखों और सरकारी ऐप में आज भी कोटवारी भूमि के रूप में दर्ज है। इसके बावजूद उक्त भूमि पर रुक्मणि विहार कॉलोनी बसाई जा चुकी है। कोटवार परिवार का आरोप है कि उन्होंने इस संबंध में शासन-प्रशासन को कई बार शिकायत की, लेकिन आज तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।


कोटवार पुत्र महिपत चौहान ने बताया कि जब उन्होंने कोटवारी भूमि पर हो रहे निर्माण और कब्जे का विरोध किया, तो उन्हें घर में घुसकर गाली-गलौज और मारपीट की धमकी दी गई। इस संबंध में कलेक्टर को भी शिकायत दी गई, परंतु अब तक कोई समाधान नहीं निकल सका।


महिपत चौहान का आरोप है कि तत्कालीन एसडीएम, पटवारी और आरआई की मिलीभगत का ही परिणाम है कि शासकीय कोटवारी भूमि पर रुक्मणि विहार खड़ा हो गया। उन्होंने बताया कि इस भूमि को लेकर सिविल कोर्ट में मामला भी विचाराधीन है, फिर भी जमीन पर कब्जा बना हुआ है।


इतना ही नहीं, खसरा नंबर 234/1 की कोटवारी भूमि पर भी रुक्मणि विहार के निर्माण का आरोप लगाया गया है। महिपत का कहना है कि कॉलोनी संचालकों का दावा है कि यह भूमि उन्होंने उनके दादाजी से खरीदी है, जबकि कानूनन कोटवारी भूमि की खरीद-बिक्री संभव ही नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि यह जमीन आखिर पट्टे वाली भूमि कैसे बन गई। इस मामले को लेकर भी सिविल कोर्ट में केस चल रहा है।


कोटवार परिवार का कहना है कि कोटवारी भूमि होना ही अब उनके लिए अभिशाप बन गया है। एक ओर भूमि पर अवैध कब्जा, दूसरी ओर प्रशासनिक उदासीनता ने उन्हें मानसिक और आर्थिक रूप से परेशान कर दिया है।


रुक्मणि विहार और कोटवारी भूमि का यह मामला अब किसी रहस्य से कम नहीं रह गया है। सवाल यह है कि जब सरकारी रिकॉर्ड में भूमि आज भी कोटवारी दर्ज है, तो उस पर कॉलोनी कैसे बस गई? यदि राजस्व विभाग इसी तरह आंख मूंदे रहेगा, तो शासकीय भूमि और परंपरागत सेवकों के अधिकार आखिर कैसे सुरक्षित रह पाएंगे।

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